Thursday, 20 October 2011

--: भ्रष्ट चालीसा BHRASHT CHALISAA :--


--: भ्रष्ट चालीसा  BHRASHT CHALISAA :--

अपने पैसे के जोर पर , अपनी सब बाते मनवाते हो  !
अपने पैसे के घमंड में चूर तुम , सारे गलत काम करते और करवाते हो !
परीक्षा में कमज़ोर  छात्रो की जगह , दुसरे को बिठ्वाते  हो  !
ख़ाली बिठवाते ही नहीं , पैसे ले कर उन्हें पास भी करवाते हो !
जब दाखला ना मिले कॉलेज में , तो दाखला भी करवाते हो !
जब जेनेरल सीट न मिले , तो आरक्षित सीट  दिलवाते हो !
आरक्षण का प्रमाण पत्र ना हो , तो वो भी बनवाते हो !
अपने पैसे के जोर पर , अपनी सब बाते मनवाते हो  !
अपने पैसे के घमंड में  चूर तुम , सारे गलत काम करते और करवाते हो .....
जब जीत की उम्मीद ना हो चुनाव  में , तो नहीं बिलकुल  घबराते हो  !
 वोटर्स को धमकाते हो , बूथों पर कब्ज़ा करते और करवाते हो !
पैसे की भूख इतनी बढ़ चुकी तुम्हारी , इंसानियत  का खून करवाते हो !
बच्चो की किताबें , दोपहर का खाना , स्वयं ही खा जातें हो !
अपने पैसे के घमंड में चूर तुम , सारे गलत काम करते और करवाते हो .....
मजदूरों को धोखा देतें , भरमाते हो  एवं आपस में लाद्वातें हो !
मजदूरों के पी ऍफ़ के  पैसे को भी , अपनी अय्याशी में लगवाते हो !
इतने सारे गलत काम करते/ करवाते हो, फिर भी इंसान  कहलाते हो !
इतने सब से पेट नहीं भरता तो , पशुओ  का चारा भी डकार जाते हो !
अपने फायदे के लिए दंगे करवाते , व भाई भाई को लड्वातें हो !
अपने पैसे के घमंड में चूर तुम , सारे गलत काम करते और करवाते हो .....
मंदिर - मस्जिद - गिरजये गिरवाते , व जल्वातें हो ! 
हिन्दू - मुश्लिम - सिख - इसाई को लड्वातें , व मरवाते हो !

इंसानियत को शर्मशार कर भी , इंसान  कहलातें हो ! 


अपने पैसे के जोर पर , अपनी सब बाते मनवाते हो  !

अपने पैसे के घमंड में चूर तुम , सारे गलत काम करते और करवाते हो .....

 अपने पैसे के घमंड में चूर तुम , नकली शराब बेचतें, व बनवातें !

नकली भारतीय मुद्रा छापते , व विदेशो में  छपवाते हो !

सरकारी भवनों - पार्को पर  तुमअपने कब्ज़े करते ,व करवातें हो !

अपने फायदें के लिए गरीब - माशूम लडकियों को उठाते , व उठवाते हो !

गरीब - माशूम लडकियों को चकला घरो में बेचतें, व बिक्वातें हो !

भूख इतनी बढ़ चुकी , अब तो चकला घर खुद ही चलते हो !

आटा दाल चावल मशाले , सभी में मिलावट करवाते हो !

ये सभी दुष्कर्म करते हुए  डरते नहीं मरते नहीं , दांत दिखलाते हो !

बेशर्मी की हद हो गई , मुर्दों को भी गीली की गई लकडियो में जल्वातें हो ! 

इनसब गलत कामों से धन इकट्ठा करते , व करवाते  हो !

अपनें देश को धोखा दे कर , सारा इकट्ठा धन विदेशो में जमा करवाते  हो !

अपने पैसे के जोर पर , अपनी सब बाते मनवाते हो  !

अपने पैसे के घमंड में चूर तुम , सारे गलत काम करते और करवाते हो .....

इंसानियत को शर्मशार कर भी , इंसान  कहलातें हो ....... इंसान  कहलाते हो ......
 
लेखक :-- एक दुखी देश प्रेमी  

नरेश कुमार शर्मा "नरेश"


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